रिश्तो का एहसास

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हमने बचपन मे एक गेम जरूर खेला होगा नहीं तो किसी बच्चे को ये खेलते जरूर देखा होगा ,जिसमे बच्चे छोटे छोटे टुकडो को जोड़कर एक आकर बनते है। कुछ इसी तरह हम रिस्तो को भी एक एक रूप देते है। बेसक हम लोग बड़े हो गए है ,पर जज्बात के मामले में हम शायद बच्चे ही है ….बस फर्क इतना है बच्चे खेल खेल में कुछ चीजो को जोड़कर अपनी मन चाही शेप बनाते है और हम वयस्क लोग अपनी जरुरतो , सिधान्तो , उम्मीदों और जज्बातों को जोड़ कर रिश्ते बना लेते है। कुछ रिश्ते ऐसे होते है जो समाज की तय की गई मान्यताओ और परम्परा पर चलकर रिश्ते बनाते और निभाते है भले ही वोह उन्हें ज्यादा पसंद ना हो पर इक तय हुए मार्ग पर चलना उन्हें जायदा सुविधाजनक लगता है। कुछ लोग अपने रिश्तो की परिभाषा अपने मन से गढ़ते है और कभी उसे पूरा तो कभी अधुरा बना कर छोड़ देते है। कुछ लोग दुसरो को देख कुढ़ कर उन्हें जीवन भर सिर्फ तोड़ने का काम करते है। 


मैने रिश्तो को ऐसे टूटते देखा है ,अपने से अपने को अलग होते देखा है ,बड़ी बेहरहमी से रिश्ते तोड़ते है यहाँ पे ,मैने रिस्तो को रिस्तो का क़त्ल करते देखा है 

एक कहानी सुनाता  हु ,जो है तो काल्पनिक लेकिन आज कल के रिश्तो पर बिलकुल सटीक बैठती है। आज कल पारिवारिक विवाद से  रिस्तो के टूटने की कई घटना आप ने जरूर सुनी होगी।  इसी पे आधारित है ,आज की ये कहानी ,
रमेश आज ऑफिस से जल्दी  घर आ जाता है ,चेहरे पर पसीना और परेशान से नजर आ रहे ,रमेश को जल्दी घर आते देख उसकी पत्नी मीना उसे पूछती है क्या हुआ आज इतनी जल्दी आ गए ,सब टिक तो है। हाँ हाँ मैं टिक हूँ परपर पर क्या हुआ ,कुछ बताओ गए। मीना ,रमेश को बिच मे टोकते हुए पूछा अरे आप कुछ बोलते को नहीं क्या हुआ ,कुछ तो बोलो। मीना ने फिर जोर दे कर पूछ ,लेकिन अभी भी रमेश कुछ बताने के हालत मई नहीं था ,उसके माथे पर चिंता की रेखा साफ दिख रही थी मीना के बार -बार पूछने पर थोड़ी हिमत कर के बाटने की कोशिस की तुम्हारे पापा का फ़ोन आया था। क्या हुआ पापा को घर पर सब टिक है ना ,अब मीना घबरते हुए ,रमेश को बिच मे टोकते हुए पूछा। हाँ घर पर सब – सब  टिक है ,फिर क्या हुआ क्या बोला  पापा ने बताओ ना | तुम कुछ छिपा रहे हो ,तुम्हे मेरी कसम बताओ क्या हुआ। मीना की आवाज अब कुछ रोनी सी हो रही थी अरे कुछ नहीं ,पापा बोल रहे थे ,कल सुरेश से उनका झगड़ा हो गया ,बात ज्यादा बढ़ गई ,अब सुरेश उनसे अलग रहना ,चाहता है ,ऐसे कैसे अलग रेहना चाहता है ,दिमाग ख़राब हो गया है क्या ? कोई अपने माँ – बाप को छोड़ कर अलग कैसे रह सकता है। अभी उसकी शादी हुए ४ महीने ही हुए है। और वो माँ -बाप से अलग होने की बात कर रहा है। भूल गया माँ -बाप ने कितनी परेशानियों से उसे पला पोशा। अपने हर अरमान दबा कर उसकी हर फरमाइश पूरी की। लोन लेकर हाई स्टर्डी कराइ। अब जब कामने लग गए तो बीबी की बातो मे आ कर अलग रहने की बात करने लगे। चलो अभी घर चलो मुझे उस से बात करनी है। मीना गुसे मे बोलती हुई। रमेश उसे शांत करते हुए। हो सकता हो सुरेश सही हो। सायद गलती तुम्हारे माँ -पापा की हो। मीना गुसे से अरे क्या बात कर रहे हो आप। मे बचपन से अपने माँ -पापा को जानती हु। अरे उन्होंने हमें पाल पोष कर बड़ा किया है। वो गलत नहीं हो सकते। और तुम ही बोलो तुम्हे क्या लगता है ? माँ -पापा गलत हैं। बोलो -लेकिन हम कर भी क्या सकते है मीना गुसे मे मैं कुछ नहीं जानती ,मुझे बस अभी घर जाना है। क्या हमारा इस समय जाना टिक रहे गा।  रमेश समझते हुए। मुझे नहीं पता मुझे जाना है तो बस जाना है। और सुरेश से बात करनी है अभी की उसकी ऐसे करने की हिमत कैसे हुई इस हालत मे रमेश मीना को रोकने मे सछम नहीं था। इसलिए वो मीना को खुद लेकर उसके घर की और निकल जाता है। मीना और रमेश ,मीना के घर पहुंचते है। अभी रमेश कार से नीचे उतरा ही था ,इतनी देर मे मीना घर के अंदर पहुंच जाती है और ड्राइंग रूम मे अपने पिता को सोफे पर बैठा हुआ पति है मीना गुस्से से तिलमति हुई अपने पापा के पास पहुँचती है ,और गुस्से से बोलती है। कहा है सुरेश  ,उसकी हिमत भी कैसे हुई ,आप लोगो से अलग रहने की। क्या इसी दिन के लिए आप लोगो ने उसे पाल पोष कर बड़ा किया था। जब माँ -बाप को बेटे की जरुरत हो तो उन्हें छोड़ कर अलग रहने लगे। मीना के पिता जी हैरानी के साथ उसकी तरफ देखते है ,फिर चिंतित आवाज मई बोलते है। “मीना ” बीटा ये क्या बोल रही हो तुम ? और तुमसे किसने कहा सुरेश  हमसे अलग रहना चाहता है ?इतनी देर मे सुरेश की बीबी भी किचन से बहार आ जाती है। मीना को लगता है ,कुछ मिस अंडर  स्टैंडिंग हो गई है।  उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा ये सब हो क्या रहा है। तभी उसने मूड दरवाजे की तरफ देखा ,रमेश दरवाजे पर खड़ा था। मीना उसे कुछ पूछती उसे पहले रमेश ने बोला। “हाँ मैने झूठ बोला था “लेकिन को क्यों ?अब तो मीना के साथ उसके घर वाले भी सच जाना चाहते थे। सब की नज़ारे रमेश पर टिकी थी। रमेश ने गम्भीर स्वर मे कहा -मेरे माँ -पापा भी गलत नहीं हो सकते ,मे  भी उन्हें बचपन से जनता हूँ। उन्होंने भी अपनी सारि इक्छाओ को मार कर मेरी सारी इक्छाओ को पूरा किया है। जरूर गलती तुम्हारी रही होगी।  मीना अब सब समझ चुकी थी। उसकी आँखो मे आँसू थे ,और कपति हुई आवाज मे बोली मुझे माफ़ कर दो ,हम आज ही माँ और बाबु जी को घर लेकर आये गए. चलिए अब देर मत करिये अरे रुको तो माँ और बाबूजी गए ही कब थे। क्या मतलब ?मीना ने आशर्य भरे स्वर मे पूछा मुझे पता था तुम्हे रिस्तो के एहमियत का  एहसास जल्दी हो जाये गए। इसी लिए मेने माँ और पिता जी को बहन के घर छोड़ कर आया था। आप भी ना बोल कर मीना रमेश के गले लग गई फिर मीना और रमेश अपने घर की और चल दिए यही तो है रिश्तो का एहसास ,आप जैसा अपने लिए चाहते हो ,वैसा ही दुसरो के साथ व्यहवार करो। रिश्ते बहुत आसान बन जायेगे।

 

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