कुछ याद उन्हें भी कर लो..जो लौट के घर न आये

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जब सावरकर को दिन में 2 कटोरी पानी दिया जाता था

दामोदर विनायक सावरकर दुनिया के अकेले ऐसे स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्हें दो-दो आजीवन कारावास की सजा मिली, जिसमे उन्हें 50 साल कालापानी में बिताने थे। दो जन्मों की सजा सुनाये जाने पर भी सावरकर मुस्कराये थे और जज को कहा कि आप ईसाई लोग तो बाइबिल के अनुसार 2 जन्म मानते ही नहीं हैं फिर आपका मुझे दो जन्मों का कारावास देना हास्यापद ही है।

इस सजा को काटने के लिए उन्हें अण्डमान निकोबार की पोर्टब्लेयर स्थित कालापानी की जेल में भेज दिया गया। काल कोठरी में सावरकर को तेल का कोल्हू चलने का काम सोंपा गया जो बेल के ही योग्य माना जाता है | सवेरे उठते ही लंगोट पहनकर कमरे में बंद होना और शाम तक कोल्हू का डंडा हाथ से घुमाते रहना | कोल्हू में नारियल की गरी पड़ते ही वो इतना भारी चलने लगता की दमदार शरीर का आदमी भी उसकी फेरियां करते रोने लग जाता |

उस कोठरी में धूप भी नसीब नही होती थी | लगातार चक्कर लगाने से श्वास भारी हो जाता और चक्कर आने से बेहोशी आ जाती | कोल्हू को चलाते-चलाते पसीने से तर हो जाते, प्यास लग जाती | जब पानी मांगते तो पानी वाला पानी नहीं देता | जमादार से शिकायत करते तो वो गुस्से में कह उठता- “दो कटोरी पानी देने का हुक्म है ” | ऐसे में नहाने की तो कल्पना करना ही अपराध था और शौच आने पर भी जाने की अनुमति नहीं मिलती थी ।

भोजन की भी वही स्थिति थी | खाना देकर जमादार कोठरी बंद कर देता और कुछ देर में हल्ला करने लगता – ” बैठो मत, शाम तक तेल पूरा नहीं हुआ तो पिटे जाओगे और जो सजा मिलेगी सो अलग | ” ऐसे में खाना निगलना भी कठिन हो जाता | कोल्हू पेरते-पेरते, थाली में पसीना टपकाते-टपकाते, कौर को उठाकर मुंह में भरकर निगलते कोल्हू पेरते रहते, क्योंकि प्रतिदिन 30 पोंड तेल जो निकालना है | तेल पूरा न होने पर कोड़ो से पिटाई भी होती थी | अंग्रेज़ों ने उनके साथ क्रूरता की सारी हदे पार कर दी थी |

वीर सावरकर ने देश की आजादी की लड़ाई में अनेक कष्ट सहे, यातनाएँ झेली फिर भी कभी अपने मार्ग से डिगे नहीं, झुके नहीं… 26 फरवरी 1966 को भारत माता का यह अन्यतम पुत्र अपने देह को छोड़ कर स्वर्ग सिधार गया । उन्हें हमारी कृतज्ञतापूर्ण श्रद्धांजलि

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