माँ मानिला का इतिहास

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सन १९६२ में हरिनगर कुणीधार में १९ दिन की चौखंडी के बाद ईस्ट का आदेश होना भोला पर बैताली घाट का दौरा दिसंबर, २८ गत्ते बुधबार सांय ४ बजे का आदेश हुआ | जिसमे हीरामणि नैलवाल ग्राम नकतुरा-सिमा का घोडा ईस्ट देव का आशन ले जाने की ईस्ट देव की आज्ञा मिली | हीरामणि के घोड़े पर आशन ६ बजकर १५ मिनट पर शाम को मनिला माँ भगवती के द्वार पर पहुँच गए | रात को एक धर्मशाला में हीरामणि और दूसरे कमरे में मेरे को रहने की आज्ञा ईस्ट देव की हुयी | धर्मशाला के बहार घोडा बांधा गया |

यह धर्मशाला चुरानी की आनंदी देवी के नाम से बने हुए थे | करनी में लाखचौरा लोग रहते थे यह लोग सिमली से गए | ठाकुर जी और ईस्ट देव की कृपा से से रात को लगभग ११ बजकर १५ मिनट पर हमारे कुल और माँ भगवती के मनिला में बसने का इतिहास ईस्ट देव ने सुरु कर दिया |

यह आवाज बहार से आती है और ऐसा महसूस होता है की जैसे पिताजी की आवाज आ रही हो |

जिसमे ईस्ट देव बता रहे हैं की पृथवी में माधिपति राजा हुए उसके बाद प्रान्त के राजा हुए जैसे – मल्हार, पांचाल, गांधार, मनुरादेश, ऐसे कई देशों का नाम बताया गया प्रसीद भगवती का अवतार मनुरादेश से हुआ |

दक्ष यज्ञ विध्वंश होने पर दुबारा रचने में ब्रह्मा, विष्णु, महेश सभी देवता और ऋषि-मुनि कनखल में बिराजमान हुए | ज्वालामुखी मनुरादेश से माँ भगवती का प्रकाश आया | दक्ष ने सभी ऋषि मुनियों और सभी देवताओं सहित शंकर जी को साष्टाङ्गत होकर चरणों में गिर पड़े और प्रणाम किया बार-बार मांफी मांग कर शरणागत हो गए | शंकर जी के खुश होने पर सभी देवता खुश हो गए | यज्ञ की दुबारा रचना हुयी | शक्ति हरिद्वार भागीरथी में प्रकाश मान हुयी इस स्थान का नाम चंडी घाट प्रसीद हुआ | वहां से फिर नील भील नाम के पर्वतों के साथ ऊपर ललित पुर में प्रकाश होने लगा|

नील पर्वत में चंडिका, भील पर्वत में मनसा और ललितपुर में काली नाम से देवी की पूजा होने लगी |

हरिद्वार कुशावर्ते नील के भील पार्वती |

स्नानतवा ललित कनखल तीर्थे पुनरजामों विद्यते ||

यहाँ सभी स्थानों पर देवी के पुजारी बौडाई लोग पूजा करते थे इस बात को वर्षों बीत चुके हैं | बोड़ाई परिवार में अम्बादत्त नाम के एक व्यक्ति थे जिनके दो पुत्र थे | बड़े पुत्र का नाम चनुआ था और छोटे पुत्र का नाम बलुवा था | चनुआ की उम्र ५७ वर्ष और बलुआ की उम्र ४८ वर्ष बताई गयी | चनुआ देवी का परम भक्त था | चनुआ बचपन से ही मठ, मंदिर, मूर्ति आदि बनाने में निपुण था इसके साथ ही साथ उसको पानी में तैरना भी आता था वह हरिद्वार ऋषिकेश आता जाता था चनुआ और बलुआ के बिच में कई दिनों से विवाद चल रहा था बलुवा चनुआ को पसंद नहीं करता था | हमेश उसको मरने के चक्कर में रहता था | वह चनुआ की कला से जलता था | चनुआ को एक संत बताया गया है बलुआ चनुआ को हमेशा परेशान करता रहता था | एक दिन अस्वनी मास शुक्ला पक्ष पाडुआ रविवार १४ गत्ते सन १३१५ में माँ भगवती की मुरित और एक छोटा सा सुराणी का पेड लेकर रात में 9 बजे चनुआ चल दिया रात में भयंकर बारिश हो रही थी चंद्र माँ का भी प्रकाश नहीं था घनघोर जंगलों में भटकते हुए जा रहा था और उसके पीछे पीछे माँ भगवती भी आ रही थी | उसको इसका पता नहीं चल रहा था माँ भगवती इनको रस्ते पर चलने लायक हल्का प्रकाश दे रही थी चनुआ अब चलते चलते घनघोर जंगलों के चक्कर लगते हुए तीसरे दिन झंडी ढैया पहुँच गया इस स्थान पर पहुँचते ही माँ भगवती ने आवाज लगायी अरे भक्त रुकजा मैं यही पर रहूंगी | आवाज सुनकर चनुआ रुक गया माँ भगवती बोली जो तुम सुराणी का पेड लाये हो इसको यहीं पर लगा दो | तुम यहाँ से कुछ दूर निचे की और चले जाओ वहां जंगल कम है और मैदान है और यहाँ पर एक झुग्गी डाल दो तुम्हारे रहने के लिए ठीक हो जायेगा दूसरे दिन चनरमाणि घूमते घूमते रामगंगा के नजदीक पहुंचे एक शिवालय मिला बता रहे हैं और इस से 130 साल पहले इसमें धुवाणा ऋषि पूजा करते थे उस समय बद्रीनाथ केदारनाथ तक की यात्रा लोग रशियों के पूल बनाकर बूढ़ा केदार होते हुए जाते थे | उस समय रामगंगा शिवालय पर मिली हुयी थी इस से बूढ़ा केदार कई साल पहले बताये गए |

रामचंद्र जी के चरण पड़ने पर इस नदी का नाम रामगंगा बताया गया है उस समय बूढ़ा केदार में कोई आबादी नहीं थी और न ही कोई पुजारी था ज्यादातर जल ही जल था ये पुजारी डूंगरी में कई सौ साल बाद बसे न कोई रास्ता था सब लोग पगडण्डी से चलते थे कोई राजधानी नहीं थी | चनरमाणि बोड़ाई के समय रामगंगा ५ फुट ७ कदम निचे चली गयी थी वहाँ से चनरमाणि जल भरते थे आधा जल शिवालय में चढ़ाते थे और आधा जल माँ भगवती की पूजा में चढ़ाते थे यह इनका नित्य रोज का नियम बन गया था | ये हरिद्वार ऋषिकेश में तैरना जानते थे तो इनके लिए रामगंगा में आर पार इधर उधर जाना बहुत ही आशाना था | रामगंगा, गगास और बिनोआ तीनो नदियों के संगम से करीब ३ से ४ फलांग उप्पेर ३-४ झुग्गी डाल दी अब इनका रामगंगा पर शिवालय और जंगल में देवी के यहाँ आना जाना नित्य रोज का काम हो गया |

एक दिन पंत गांव के लीलाधर पंत चनरमाणि को मिले उनहोंने चनर मणि से कहा मुझे रामगंगा के किनारे बहुत अच्छा लगा इसीलिए इसमें से एक झुग्गी आप मेरे को दे दो चनुआ ने कहा ये तो बड़ी ख़ुशी के बात है आप आ जाओ मेरा भी साथ हो जायेगा कुछ दिनों के बाद लीलाधर पंत के साथ गधेरापनी का मनिआ नाम का माग्छ्वाड़ी एक झुग्गी में परिवार के साथ रहने लगा माग्छ्वाड़ी का परिवार अब बहुत बढ़ गया था और साथ ही साथ लीलाधर पंत भी अपने गाओं से दूध, दही, साग, सब्जी लाया करते थे |

अब कभी कभी चनर मणि भी रात को लीलाधर पंत के साथ रुक जाते थे और फल फूल साग सब्जी साथ साथ खाते थे और भी सुबह गंगाजी में नहाने के बाद शिवालय में जल चढ़कर फिर जंगल में माँ भगवती की पूजा करना नित्य का काम था | जिस स्थान पर चनुआ की झुग्गी डाली थी कुछ दिन बाद उसका नाम चौना प्रसीद हुआ रामगंगा पार चन्दन नगर हो गया | चन्दन नगर में अब चहल पहल होने लगी इसके बाद 5-६ महीने बाद बलुवा को पता चला तो वह एक और को साथ में लेकर मनुरादेवी के नजदीक पहुंचा जहा पर चनुआ ने भगवती की मूर्ति राखी थी सुरानी का पेड बगल में था | वह पर चनुआ ने साफ़ सफाई कर के अच्छा बनाया था वह से देखने पर चनुआ का इधर उधर पता नहीं चलता था | क्यूंकि यहाँ पर घनघोर जंगल था बलुवा यहाँ पर अपने भाई चनुआ को मरने आया था लेकिन भाई वहां ही मिला तो वह माँ भगवती का ही हाथ काट लाया साथ ही कह भी रहा है की अब दोनों नहीं बचेंगे न चनुआ और न ही चनुआ की देवी जितना खाना था खा लिआ और बलुआ माँ भगवती का हाथ काट कर साथ में लेकर भाग गया | जाते जाते ये बहुत उप्पर ले गया काफी ऊपर ले जाने के बाद यहाँ पर इनको जल दिखाई दिया यहाँ पर इन्होंने हाथ को निचे रखा और पानी पिने का विचार बनाया पेशाब करके पानी पिया और हाथ को उठाने लगे लेकिन हाथ नहीं उठा बहुत बल लगाया ताकत दिखाई कोसिस बहुत की परन्तु भुजा नहीं उठी हार कर ये वापस घर को आ गया घर पहुँचते ही बलुआ पर लखुआ पड़ गया और उसका अंग भंग हो गया|

आज यह स्थान मल्ली मनिला के नाम से प्रसीद है दोनों स्थानों पर अपार शक्ति है तल्ली मनिला में चनर मणि ने पांच मान्यां बनाये एक में महमन्ता बीर दूसरे में रहमंत बीर तीसरे में लोडिया बीर चौथे में भैरो अगवानी पांचवे में काली देवी इन नामो से पांचो मान्याओ की स्थापना कर दी कुछ दूर पर सुरानी के पेड के निचे देवी की पूजा होती आ रही है यही पर एक छोटा सा मंदिर भी बना दिया|

चन्दर नगर में भी इनकी पहचान हो गयी निचे भवर से भी लोग यहाँ बसने लगे इनकी उम्र ५०० वर्ष से भी ऊप्पर बताई गयी है ये कभी कभी द्वारहाट भी जाते थे द्वारहाट में इन्होने मठ मंदिर बनाये अपनी कला को इन्होंने द्वारहाट में भी दिखाया और इसी दौरान में माँ भगवती की स्थापना भी की जो दुनागिरि के नाम से प्रसीद है और अपने कार्य को पूर्ण करते हुए इन्हों ने माँ भगवती की स्थापना की जो आज पूर्णागिरि के नाम से प्रसीद है |

यह बताया गया है की तल्ली मनिला मल्ली मनिला और शिवालय में बोड़ाई जी ३५० वर्ष तक पूजा करते रहे | जब चनर मणि द्वारहाट दुनागिरि और पूर्णागिरि जाते थे तो तल्ली मनिला मल्ली मनिला और शिवालय में पूजा पंत लोग करते थे बताया गया है की अंत में संत चनर मणि जागेश्वर धाम बसे अब चन्दर नगर में माग्छ्वाड़ी परिवार काफी बढ़ गया है पंत का परिवार अब सिंगोली पट्टी द्वार चला गया है इसमें अब भिख्वा माग्छ्वाड़ी नाम के पुत्र ने जन्म लिया इसके पिता का नाम जसवंत माघच्वाङी बताया गया है |

भिख्वा माघच्वाडी के पिता जसवंत माघ्क्बादी लगभग ९७ वर्ष की उम्र में इस संसार को छोड़कर चले गए माघच्वाडी परिवार पहले से ही बहुत बड़ा था अब भिख्वा माघच्वाडी के भी पांच लड़के और दो लड़ियाँ हो गयी बताया गया है अब भिख्वा माघच्वाडी के परिवार में चहल पहल हो गयी और इसका कारोबार भी बहुत बढ़ गया था | इसके अपने पानी के घराट, काटने वाले कुत्ते, मारने वाले जातीय तथा 8-१० आदमी इसके साथ हमेशा होते थे यह बहुत अभिमानी और अन्यायी था | इस चन्दर नगर में सारा खेल मेरा है यह कहता था |

चन्दन नगर में अब भिख्वा माघच्वाडी का अत्याचार बढ़ने लगा इसने चन्दन नगर का नाम हटा कर भिख्वा माघच्वाडी के नाम से भिक्यासेन रख दिया अब इसका नाश करने के लिए धर्म का अवतार हरूहीत जी हुए

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