एक बच्चे की कहानी

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एक बार मे एक गली से गुजर रहा था। उस गली के एक घर से एक छोटे बचे के रोने की आवाज आ रही थी। उस आवाज में इतना दर्द था की उसे सुन कर मेरे पैर वही रुक गए। उस आवाज मे  इतना दर्द था ,मैं अपने को उस घर के अंदर जाकर बच्चा को रो रहा है ,ये जानने से नहीं रोक पाया। अंदर जाके जो मैने देखा उसे देख कर मैं खुद भी दंग रेह गया। एक माँ अपने बच्चे को मार रही थी ,और उसके साथ खुद भी रो रही थी। मैने उनसे पूछा बहन जी आप इसे क्यों मर रही हो ,जबकि इसके साथ आप खुद भी रो रही हो। उस औरत ने रोते हुए जवाब दिया क्या बोलू भी साहब किस्मत की मरी हुई हूँ। इसके पिता जी ,इसके होने पर हम दोनों को छोड़ कर भगवन के पास  गए ,मैं लोगो के घर में बरतन साफ कर के किसी तरह से इसे पढ़ा रही हूँ ,जिसे ये आगे चल के एक अछि जिन्दी जी सके। लेकिन ये है की पढ़ाई में ध्यान ही नहीं देता ,हमेशा स्कूल लेट पहुँचता है ,और घर भी लेट आता है ,पुरे टाइम बस खेल मे बिता देता है ,और तो और इसके इस लेट जाने की वजह से टीचर इसे स्कूल से निकले की बात कर रहे थे ,अब आप ही बताइये मे  क्या करू। मैने बच्चे की माँ और उस बच्चे को समझा कर वह से चला गया। 
इस घटना को बीते कई दिन हो चुके थे। एक दिन जब मैं घर पे था , तभी मेरी बीबी ने मुझसे कहा ,सुनो जी आज आप घर पे हो तो ,मंडी से आलू लेते आते, होली आ रही है ,सोच रही हु ,आलू के पापड़ बना लू , मंडी मे  आलू थोड़े सस्ते मिल जाये गए ,और कुछ सब्जी भी लेते आना। मैं सब्जी का थैला लेकर मंडी की तरफ निकल गया। मंडी में अचानक मेरी नजर उस बच्चे पर पड़ी जिसकी माँ उसे उस दिन मार रही थी। वहाँ जो देखा उसे देख कर मेरी आँखे खुली की खुली रह गई। मैने देखा वो लड़का मण्डी मे घूम रहा है ,और जो दुकानदार अपने दुकान के लिए सब्जी खरीद कर अपने बोर में डालते तो उसमे से कुछ सब्जी बहार गिर जाती ,वो उसे उठा कर अपने थैले में डाल लेता। ये सब देख कर मेरा दिमाग चकराने लगा ,आखिर ये लड़का करना क्या चाहता है। इन बातो को जानने के लिए मे उस लड़के पे छिप कर नजर रखने लगा। जब लड़के का बेग सब्जी से भर गया तो वो सड़क के किनारे बैठ कर ऊंची -ऊंची आवाज मे सब्जी बेचने लगा। 
सब्जी ले लो सब्जी ताजी सब्जी। थोड़ी ही बची है सब्जी ले लो सस्ते में ले लो। “सब्जी ले लो सब्जी “
तभी मैंने देखा की एक आदमी अपनी दुकान से उठा ,जिसकी दुकान के आगे उस बच्चे ने अपनी छोटी सी दुकान लगा राखी थी। उसने आते ही एक लात में उस नन्ही सी दुकान को सड़क पे बिखेर दिया ,और उसका हाथ पकड़ के उसे धका  दे कर गिरा दिया। भाग यहाँ से कहा कहा से चले आते है ,दुबारा यहाँ दिखा तो तेरी टांगे तोड़ दुगा ,चल भाग। वो बच्चा अपने आँखों में आशू लिए अपनी सब्जियों को इकठा करके डरते हुए ,दूसरी दुकान के सामने अपनी छोटी सी दुकान फिर से लगा ली ,दूसरा दुकान दार सजन आदमी था ,उसने उसे कुछ नहीं कहा। बच्चे के पास थोड़ी ही सब्जी थी और बाकि दुकानदारों से काम पैसे की थी ,इस लिए सब्जी जल्दी बिक गई। मुंह पर मिट्टी गन्दी वर्दी और आंखों में नमी, ऐसा महसूस हो रहा था कि ऐसा दुकानदार ज़िन्दगी में पहली बार देख रहा हूँ ।वह बच्चा उठा और बाज़ार में एक कपड़े वाली दुकान में दाखिल हुआ और दुकानदार को वह पैसे देकर दुकान में पड़ा अपना स्कूल बैग उठाया और बिना कुछ कहे वापस स्कूल की और चल पड़ा। और मैं भी उस के पीछे पीछे चल रहा था।जब वो बच्चा स्कूल पंहुचा तो १ घण्टे  लेट हो चूका था। जिसपर उसके टीचर ने कहा -आगया नालायक ,आज भी लेट। इतना बोल कर उसके टीचर ने उसे डण्डे से खूब पीटा। मैं जल्दी से टीचर के पास गया और टीचर को रोकते हुए बोला। मासूम बचा है सर इसे इतना मत मारो। टीचर ने गुसे मे जवाब दिया। आप नहीं जानते सर ,ये लड़का हमेसा लेट आता है ,मे इसे इस लिए मारता हूँ ,सायद ये मार के डर से स्कूल टाइम से  आजाये। लेकिन इस ढीठ को मार  का कुछ असर ही नहीं पड़ता। मैने इसके घरवालों से भी इसकी शिकायत की ,लेकिन लगता है ,इसके घर वाले भी इसको नहीं समझते। इसकी वर्दी तो देखिये कितनी गन्दी है। पता नहीं कैसे घर वाले है। 
खैर बच्चा मार खाने के बाद क्लास में बैठ कर पढ़ने लगा। मैने उसके टीचर का मोबाइल नम्बर लिया और घर की तरफ चल दिया। घर पहुंच कर एहसास हुआ कि जिस काम के लिए सब्ज़ी मंडी गया था वह तो भूल ही गया। मासूम बच्चे ने घर आ कर माँ से एक बार फिर मार खाई। सारी रात मेरा सर चकराता रहा।
मै रात भर सो नहीं पाया सुबह होते ही मैने स्कूल टीचर को मंडी आने के लिए मनाया और वो मन गए। सूरज निकलते ही बच्चा स्कूल जाने के लिए तैयार हो कर सीधे मण्डी पहुँचता है। और अपनी नन्ही सी दुकान की तैयारी में लग जाता है। मै उसके घर पहुंच कर उसकी माँ से बोलता हूँ। बहनजी मेरे साथ चलिए मैं आप को दीखता हूँ आप का बीटा स्कूल लेट को जाता है। लड़के की माँ  साथ चलने लगती है ,और बड़बड़ाती हुई बोलती है। आज इस लड़के के में हाथ पैर तोड़ दूगी। जीना दुस्वार कर दिया है ,इसने। टीचर जी पहले ही पहुंच चुके थे। अब हम तीनो चुप कर सब कुछ देखने लगते है। आज भी उसे काफी लोगों से डांट फटकार और धक्के खाने पड़े, और आखिरकार वह लड़का अपनी सब्ज़ी बेच कर कपड़े वाली दुकान पर चल दिया।फिर मेरी नजर उसकी माँ पर पड़ी जो दर्द भरी सिसकियाँ ले कर रो रही थी। और बार बूल रही थी भगवन किसी को गरीब न बनाये। हाय रे मेरा बच्चा। और मैने फौरन उस के टीचर की तरफ देखा तो बहुत शिद्दत से उसके आंसू बह रहे थे। दोनो के रोने में मुझे ऐसा लग रहा था जैसे उन्हों ने किसी मासूम पर बहुत ज़ुल्म किया हो और आज उन को अपनी गलती का एहसास हो रहा हो।उसकी माँ मंडी से घर चली गई ,और टीचर भी स्कूल के लिए निकल गए ,मैं वही लड़के को देखता रहा ,लड़का पैसे लेकर फिर कपडे की दुकान मे  गया ,और दुकान दार को सरे पैसे दे दिए। दुकानदार ने बच्चे को एक सूट का कपडा देते हुए बोला। ये लो  कपडे अब इसके पुरे पैसे हो चुके है। लड़का कपडे को अपने स्कूल बेग में रख कर अपने स्कूल के लिए निकल जाता है ,मैं भी उसके पीछे -पीछे उसके स्कूल के लिए चल देता हूँ। आज फिर लड़का स्कूल लेट पंहुचा, अपने बेग को डेस्क पर रख के सीधा टीचर के पास मर खाने को चला जाता है,और अपने हाथ को आगे कर देता है। लेकिन ये क्या टीचर उसे मारने की जगह गले लगा के जोर -जोर से रोने लगते है। टीचर को इस तरह रोटा देख मे भी अपने आशुओं पे काबू न पा सका। मैने अपने आप को संभाला और आगे बढ़कर टीचर को चुप कराया और बच्चे से पूछा कि यह जो बैग में सूट है वह किस के लिए है। बच्चे ने रोते हुए जवाब दिया। ” मेरी माँ अमीर लोगों के घरों में मजदूरी करने जाती है ,और उसके कपड़े फटे हुए होते हैं, कोई जिस्म को पूरी तरह से ढांपने वाला सूट नहीं और और मेरी माँ के पास पैसे नही हैं इस लिये अपने माँ के लिए यह सूट खरीदा है।”अब फिर  से मैने सवाल पूछा -तो यह सूट अब घर ले जाकर माँ को आज दोगे?  जवाब ने मेरे और  टीचर के पैरों के नीचे से ज़मीन ही निकाल दी। बच्चे ने जवाब दिया- नहीं अंकल छुट्टी के बाद मैं इसे दर्जी को सिलाई के लिए दे दूँगा। रोज़ाना स्कूल से जाने के बाद काम करके थोड़े थोड़े पैसे सिलाई के लिए दर्जी के पास भी  जमा किये हैं।
टीचर और मैं सोच कर रोते जा रहे थे कि आखिर कब तक हमारे समाज में गरीबों के साथ ऐसा होता रहेगा उन के बच्चे त्योहार की खुशियों में शामिल होने के लिए जलते रहेंगे आखिर कब तक।
क्या ऊपर वाले की खुशियों में इन जैसे गरीब का कोई हक नहीं ? क्या हम अपनी खुशियों के मौके पर अपनी ख्वाहिशों में से थोड़े पैसे निकाल कर अपने समाज मे मौजूद गरीब और बेसहारों की मदद नहीं कर सकते।
इस कहनी से हम सिर्फ और सिर्फ उन सक्षम लोगो  के दिल मे गरीबों के प्रति हमदर्दी का जज़्बा जगाना चाहते है ,जिनकी थोड़ी सी मदद से किसी गरीब के घर की खुशियों की वजह बन जाये। 

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