चिट्ठी आई है –

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यूनिट के पोस्टल डिपार्टमेंट में एक जवान रोज आता ,और पूछता साहब मेरे घर से कोई चिठ्ठी आई है क्या और रोज पोस्टल वाले उसे ना बोल  देते ,जब वो बाकि जवानो के हाथ में चिठ्ठी देकता तो मायूश हो कर अपनी यूनिट लोट जाता। 
लेकिन वो अत रोज था ,और बस ये ही प्रशन पूछता और  उसे हर बार ना में ही जवाब मिलता , पोस्टल वाले भी अब उसे उसके नाम और यूनिट से जानने लगे थे। 
एक बार पोस्टल डिपार्टमेंट नई आई हुई चिठियो को छांट रहा था ,तभी उनमे से एक बन्दे ने ख़ुशी से चिलाय लो जी आ गई भाई की चिठ्ठी। 
वो रोज आता था ,मगर आज वो आया नहीं। पोस्टल डिपार्टमेंट में  कई लोग उसका इंतजार कर रहे थे। कोई न कोई आ के पूछता आया क्या वो। 
“लो जी रोज आता था चिठ्ठी आई है क्या पूछने ,आज चिठ्ठी आई तो जनाब  नहीं आये । “
एक ने बोला रोज ना सुनते सुनते परेशान हो गया हो गा ,लाओ में ही उसकी यूनिट मे जाकर दे आता हूँ। पोस्टल डिपार्टमेंट भी उसकी चिठ्ठी आने पर इतना खुश  था ,मानो कई महीनो बाद उनकी चिठ्ठी आई हो। 
अभी चिठ्ठी ले कर निकले वाला ही था ,तभी उसकी यूनिट का बन्दा आ गया ,
तुरंत ही सबने पूछा अरे तुम्हरे यूनिट का वो बंदा कहा है रोज आता  था पूछने चिठ्ठी आई है क्या। आज चिठ्ठी आई तो वो आया ही नहीं तुम्हारी ही यूनिट में ,उसकी चिठ्ठी देने जा रहा था। 
दूसरे बंदे ने उनहे बोला ,सर अब उसे इस चिठ्ठी की कोई जरुरत नहीं ,ये यूनिट की  चिठ्ठी उसके घर भेजनी है। 

कल आतंक वादियों से लड़ते लड़ते वो सहीद हो गया। 
पुरे पोस्टल डिपार्टमेंट में मनो सनाटा छा गया। 

जो रोज अपने घर की चिठ्ठी के बारे में पूछने उनके पास आता था ,आज उसी के सहीद  होने की चिठ्ठी उसके घर भेजनी थी।

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